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ثلاثون ألف دينار

ـ1ـ

(في بيت ربيعة بن أبي عبد الرحمن)

هالة    :   الحمد لله هأنتذا جئت يا ربيعة.

ربيعة   :   هذا موعد مجيء من المسجد كل يوم فما خطبك يا هالة؟

هالة    :   لا يمكن أن يستمر هذا المجال أبدا.

ربيعة   :   ويحك قد سبقك إلى ذلك بن ربيعة إذ يقول:

ألا كل ما خلا الله باطلا      وكل نعيم لا محالة زائل

هالة    :   لا تحاول أن تتجاهل ما أعنى يا ربيعة.

ربيعة   :   يا أم فاطمة أنك ترينني أقضى سحابة يومي في حل مشكلات الناس في المسجد وأعود من الظهر لأستريح فأجدك تستقبلين بأعضل منها في البيت.

هالة    :   كان أحبي بك أن تحل مشكلات بيتك قبل أن تتصدى لحل مشكلات الناس.

ربيعة   :   لو كان ببتي حراً مستقلاً لا سلطان لأحد من خارجة على أحد فيه لما قامت به أي مشكلة.

هالة    :   إنك تقصد أمي. لا شغل لك غير أمي. كل ما يقع في الكون فسببه أمي عندك.

ربيعة   :   في الكون كله يا هالة؟ إذن لكان نصيباً من كيدها يسيراً لا يذكر فاحتملناه ولكنها ـ واأسفاه ـ لا تسلط كيدها على الكون كله بل على بيتها وحده.

هالة    :   هكذا أنت دائماً تحمل على أمي وتفضي عن أمك التي هي السبب في كل ما يحدث.

ربيعة   :   (كالساخر) في الكون كله يا هالة؟

هالة    :   (في حدة ) بل في بيتنا هذا.

ربيعة   :   أصغى إليّ يا أم فاطمة وكوني منصفة: أمك لها بيت غير بيتنا هذا فأما أمي فهذا بيتها لا بيت لها غيره.

هالة    :   بيتها؟

ربيعة   :   نعم.

هالة    :   وليس بيتنا؟

ربيعة   :   بلى.

هالة    :   كلا. أما أن يكون بيتنا نحن أو بيتها هي.

ربيعة   :   إذن فهو بيتها وبيت زوجها في الأصل.

هالة    :   زوجها؟

ربيعة   :   الذي هو أبي واسمه فرّوخ وكنيته أبو عبد الرحمن ومن موالي آل المنكدر.. أما سمعت به من قبل قط؟

هالة    :   ذاك الذي ذهب ولم يرجع؟

ربيعة   :   خرج يقاتل في سبيل الله يا هالة ولعله قتل في سبيل الله فهو شهيد.

هالة    :   أليس ذلك منذ عشرين سنة؟

ربيعة   :   بل منذ سبع وعشرين سنة. خرج وأنا حمل في بطن أمي. وأنا الآن في السابعة والعشرين.

هالة    :   ويبقى هذا البيت بيته بعد هذا الدهر الطويل؟

ربيعة   :   يبقى بيت أرملته التي هي أمي كما بقى بيت أبيك بعد وفاته بيت أرملته التي هي أمك.

هالة    :   إذن فليس لنا نحن بيت.

ربيعة   :   بيت أمي هذا هو بيتنا.

هالة    :   يحق لها إذن أن تصنع بنا ما تشاء ما دام من حقها أن تطردنا من البيت حين تريد.

ربيعة   :   أجل إن لها ذلك ولكنها أحنى وأكرم من أن تطرد أبنها أو امرأته أو ابنته.

هالة    :   بل لا تريد أن تطردنا فتريحنا. كيف تعذبنا وتنكل بنا ما شاء لها حقدها وهواها لو طردتنا.

ربيعة   :   أمي التقية المؤمنة الصابرة تحقد على أحد منا؟

هالة    :   على أنا خاصة لاعتقادها أنني سرقت منها قلبك وحبك.

ربيعة   :   يا هذه اتقي الله فإنها هي التي اختارتك لي زوجة.

هالة    :   اختارتني لأكون لها أمة تأمرها فتطيع وتقهرها فتسكت.

ربيعة   :   خبريني ماذا جئت عليك اليوم فأثارت فيك كل هذه الموجدة؟

هالة    :   انهالت على الطفلة الصغيرة ضربا ولطماً وقرصاً حتى كاد يغشى على المسكينة.

ربيعة   :   ولم تمت المسكينة بعد هذا كله؟

هالة    :   تضحك وتسخر؟ أنا الملمومة إذ أشكوها إليك. أنت لا تسمع فيها أي شكاية.

ربيعة   :   أين هي الآن؟

هالة    :   خرجت.

ربيعة   :   وأين فاطمة؟

هالة    :   جرجرتها معها.

ربيعة   :   والطفلة تبكي وتصيح.

هالة    :   نعم.

ربيعة   :   إلى أين؟

هالة    :   لا أدري.

ربيعة   :   لتبتاع لنا بعض الفاكهة. ألا تحمدين الله يا هالة؟ إنها هي التي تعمل لك كل شيء في البيت وخارج البيت.

هالة    :   هذا من حرصها على السيطرة. لا تترك لي من العمل إلا ما تأمرني به.

ربيعة   :   سبحان الله لا يرضيك منها شيء أبدا.

            (يسمع صوت فتح الباب)صه ها هي ذي جاءت.

أمينة   :   هاهو ذا أبوك قد سبقنا إلى البيت يا فاطمة.

فاطمة  :   انظر يا أبي ماذا اشترت لي جدتي اليوم.

ربيعة   :   أريني يا فاطمة. يالله. هذه لعبة جميلة.

فاطمة  :   حلوة يا أبي؟

ربيعة   :   حلوة مثلك يا فاطمة. لكنها كبيرة. ألا يثقل عليك حملها؟

فاطمة  :   لا يا أبي. هذه خفيفة. سأريها لصاحبتي عزة.

أمينة   :   لا تتأخري عندها كثيراً يا فاطمة فإننا سنتغدى بعد قليل.

فاطمة  :   لا يا جدتي لن أتأخر. سأعود في الحال.(تخرج).

ربيعة   :   هل ضربتها اليوم يا أمة؟

أمينة   :   من الذي أخبرك يا بني؟

هالة    :   أنا التي أخبرته.

أمينة   :   أتريد يا بنى أن تعرف لماذا ضربتها؟

ربيعة   :   لا يا أمة لابد أنها فعلت ما تستحق عليها الضرب.

هالة    :   لماذا لا تريد أن تسمع السبب؟

ربيعة   :   لأن هذه يا هالة هي التي ربتني فجعلتني وأنا في العشرين أزاحم شيوخ العلم والفقه في هذا البلد.

أمينة   :   سأذكر لك السبب يا بنى. عادت اليوم تلعب مع الغلمان وكنت قد حذرتها مراراً ألا تعلب إلا مع البنات.

هالة    :   أمثل هذا يقتضي ضربها ذلك الضرب الشديد؟

أمينة   :   نعم. أتدرين يا أم فاطمة لماذا ابتعت لها هذه الدمية؟

هالة    :   لتسترضيها فلا تشكوك إلى أبيها.

أمينة   :   ويحك من أبوها هذا؟ أليس ابني؟ أفأخاف أنا من ابني؟

هالة    :   هذه طريقتك. تجرحين وتأسين.

أمينة   :   سامحك الله يا بنيتي.إنما اشتريت لها اللعبة لتقوم منها مقام الأم فتشعر أنها أنثى فلا تلعب إلا مع البنات.

ربيعة   :   أسمعت يا هالة كيف تكون التربية. اسمعي الآن ما يقول الشاعر في مثل ما نحن فيه الآن.

ربيعة   :   دعني من أشعارك.

إن  مـن الشعر لحكمة يا iiهالة
أرى أم صـخر لا تمل iiعبادتي
وأي امـرئ سـاوى بأم iiحليلة



اسـمعي أخا الخنساء إذ iiيقوك:
وملت تسليمي مضجعي ومكاني
فـلا عـاش إلا في أشد iiهوان

ـ2ـ

(في مشارق المدينة المنورة).

 صالح   :   أهلا بك يا فروخ. الحمد لله إذ عدت إلينا سالما بعد هذا الغياب الطويل.

فروخ   :   الحمد لله يا صالح. ما كنت أظن أن عيني سترى مدينة رسول الله صلى الله عليه وسلم مرة أخرى.

صالح   :   لقد ظن الناس فيها أنك...

فروخ   :   قد مت؟ ويحهم سيفاجأون غدا حين يرون أني حي بعد وقوى جلد.

صالح   :   أجل أنت والله شاب بعد. لكن ما الذي أطال غيبتك إلى هذا الحد؟

فروخ   :   كنت في أسر العدو يا صالح.

صالح   :   طوال هذه المدة؟

فروخ   :   نعم ما خلا بضعة شهور بعد إطلاق سراحي قضيتها في التجارة لأعود إلى أهل بيتي يا صالح. لكن خبرني كيف عرفت موعد قدومي إلى المدينة؟

صالح   :   من الكتاب الذي أرسلته إلى أهلك من ينبع.

فروخ   :   كأنهم هم الذين بعثوك لتستقبلني؟

صالح   :   من؟ أمينة. ابنة عمي؟

فروخ   :   ويلك.. امرأتي.

صالح   :   ويحك يا أبا عبد الرحمن كأنك لا تعلم شيئاً مما حدث البتة.

فروخ   :   ماذا تعني ويلك؟ ماذا حدث؟

صالح   :   يعز على والله أن أكون أول من يبلغ هذه الأبناء السيئة إليك.

فروخ   :   لا بأس. قل وعجل ماذا حدث؟ هل ماتت أمينة؟

صالح   :   إذن لهان الأمر يا أبا عبد الرحمن؟

فروخ   :   ويلك أتريد أن تقول إنها......

صالح   :   نعم.. تزوجت يا أبا عبد الرحمن.

فروخ   :   ويلهم كيف وهي في عصمتي؟

صالح   :   حكم لها القاضي بفسخ العقد إذ طالبته بذلك قبل زواجها من ذلك الرجل الذي أحبته ورفضت من أجله سائر خطابها الكثيرين.

فروخ   :   هي التي طلبت فسخ العقد من القاضي؟

صالح   :   نعم.

فروخ   :   خائنة قليلة الأصل. ثلاثين ألف دينار تركتها عندها وتتزوج بعد سبع سنوات من غيابي. لا تقدر أن تصبر أكثر من سبع سنين.

صالح   :   لو كنت مكانك يا فروخ لعدت الآن من حيث أتيت فليس في وسعي أن احتمل رؤية زوجها الجديد يقيم معها في بيتي.

فروخ   :   كلا والله لأقتحمن البيت عليها فلأخرجنها منه.

صالح   :   خذ حذرك يا فروخ فإن زوجها شاب جلد اسمه ربيعة.

فروخ   :   اسمه ربيعة؟

صالح   :   نعم.

فروخ   :   شاب؟

صالح   :   في سن إليكما عبد الرحمن لو لم يمت وعاش حتى الآن.

فروخ   :   ويل له مني.. لأرينه أنني أقوى منه واجلد.

ـ3ـ

(أمام بيت ربيعة بالمدينة)

ربيعة   :   ما هذا الذي تصنع هنا يا رجل؟

فروخ   :   أنت ربيعة.

ربيعة   :   نعم.

فروخ   :   تسألني ماذا أصنع؟

ربيعة   :   نعم.

فروخ   :   ما شأنك أنت؟ أريد أن أربط فرسي بحلقات الباب.

ربيعة   :   ليس هذا مربطاً للخيل. اربطها في مكان آخر.

فروخ   :   لا اربطها إلا بهذه الحلقة.

ربيعة   :   لا بأس. سأحتملك من أجل أنك غريب. فاربط فرسك في فناء الدار.

فروخ   :   كلا لا اربطها إلا هنا.

ربيعة   :   يا أخي لا ينبغي للرجل الغريب أن يكون أحمق.

فروخ   :   أنا أحمق يا لكع؟

ربيعة   :   كلا أنا ما قلت إنك أحمق. بل قلت إن الحماقة لا تحسن بالغريب.

فروخ   :   تنح عن الباب ودعني أدخل.

ربيعة   :   أين تريد أن تدخل يا راجل؟

فروخ   :   إلى بيتي.

ربيعة   :   ويحك ليس هذا بيتك.

فروخ   :   ويلك أخذت امرأتي وتريد أيضاً أن تأخذ بيتي؟

ربيعة   :   يا هذا لعلك ضللت الطريق إلى بيتك من طول الغربة.

فروخ   :   كلا هذا بيتي فتنح عن الطريق وإلا أدبتك.

ربيعة   :   ويلك تنح هذا الرمح عني فقد كدت تصيب بزجة ساقي.

فروخ   :   هذا جزءاً من يقيم في دار غيره بغير حق. وددت والله لو أغرسه في نحرك.

ربيعة   :   يخيل إلى أنني بين يدي رجل مجنون.

فروخ   :   (في غضب) مجنون؟ أنا مجنون؟ لآخذ بتلابيبك يا ملعون؟

ربيعة   :   أرسل عنقي ويلك.

فروخ   :   لا والله فأفارقتك إلا عند السلطان.

ربيعة   :   أشهدوا يا قوم ماذا يفعل هذا المعتدى العتل.

            (يجتمع الناس من كل مكان ويعلو الضجيح ويكثر الصخب).

صوت  :   صه. اسكتوا يا قوم. هذا مالك بن أنس قد أقبل. (يسكت الجميع).

مالك    :   ايهذا الرجل لك سعة في غير هذه الدار.

فروخ   :   هذا داري يا سيدي الشيخ. أنا فروخ مولى آل المنكدر قد مات في حرب خراسان من زمن بعيد.

فروخ   :   كلا ما مات فروخ ولكنهم أمتموه لتعطوا امرأته لهذا الرجل.

ربيعة   :   انظروا يا قوم إلى جرأة هذا الرجل على الحق. يزعم بكل صفاقة أن امرأتي ـ وكلكم يعلم أني تزوجتها بكرا ـ كانت امرأته.

أمينة   :   (صوتها من أعلى الدار) يا ربيعة. هذا الذي تقاتله هو فروخ أبوك.

ربيعة   :   ماذا تقولين؟

أمينة   :   هذا زوجي الذي غاب عني سبعا وعشرين سنة.

فروخ   :   ويحك يا أمينة أليس ربيعة هذا زوجك؟

أمينة   :   لا زوج لي غيرك يا رجل. هذا ابني وأنت أبوه.

مالك    :   الحمد لله الذي جمع الشمل ورد الغائب إلى الأهل. تفرقوا الآن يا قوم يرحمكم الله.

            بتفرق الناس في صخب وهم يتبادلون العجب).

ربيعة   :   سامحني يا أبي إذ لم أغرفك.

فروخ   :   (بعانقة) بل سامحني أنت يا بني فقد استفززتك عامداً ظناً مني أنك غريمي.

ـ4ـ

(في داخل البيت)

فروخ   :   إذن فكل ما قاله صالح ابن عمك يا أمينة كذب واختلاق.

أمينة   :   أجل يا أبا عبد الرحمن لا سامحه الله.

ربيعة   :   أنه يحقد على أمي منذ رفضت مشورته.

فروخ   :   وماذا كانت مشورته؟

ربيعة   :   أن تذهب إلى القاضي ليحكم لها بالفسخ فيتزوجها هو.

أمينة   :   لحاه الله. أنه كان يطمع في المال الذي عندي.

فروخ   :   أكنت تقبلينه يا أمينة لو لم يكن طامعاً في مالك؟

أمينة   :   كلا لقد أليت لا أتزوج من بعدك أبداً حتى أتفرغ لتربية ابنك ربيعة.

أمينة   :   لكن كيف علم صالح بموعد قد ومك يا أبي فاستقبلك من دوننا؟

فروخ   :   زعم لي أنه علم بذلك منكم.. من الكتاب الذي أرسله إليكم من ينبع.

ربيعة   :   أنت أرسلت إلينا كتاباً من ينبع؟

فروخ   :   نعم مع نجاب خاص.

ربيعة   :   إذن فلابد أن صالحا هو الذي تلقى الكتاب فلم يشأ أن يسلمه لنا.

فروخ   :   وكتبت إليكم كتاباً قبله من خراسان على أثر خروجي من الأسر.

أمينة   :   ما وصل إلينا شيء يا أبا عبد الرحمن.

ربيعة   :   لعل صالحا هو الذي تلقاه أيضاً فحجبه عنا.

فروخ   :   لعنة الله على صالح. والله لأقتلنه. أنه يستحق العتل.

ربيعة   :   يا أبي دعه لما به خيراً لك وشراً عليه فكفاه ما به من الحسد والخيبة ويحسبك إن الله قد ذخر أمي لك وحدك وأعادت إلينا سالما فالحمد لله على ذلك.

فروخ   :   صدقت يا بني إنها لنعمة تهون من بعدها كل المحن والخطوب.

أمينة   :   أنك لم تسألني عن الثلاثين ألف دينار التي تركتها عندي يوم رحلت.

فروخ   :   أجل كم بقى منها يا أمينة.

أمينة   :   لقد نميتها لك يا أبا عبد الرحمن فصارت ضعفيها.

فروخ   :   ستين ألف دينار؟

أمينة   :   نعم.

 


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