المسرحيات القصيرة->المسرحيات التاريخية
الأسير الكريم (خبيب بن عدي)

1

(في بيت من بيوت سراة مكة)

(الصبي عامر يقبل مسرعاً إلى أمه الجالسة في الحجرة)

عامر     :   (صوته قبل ظهوره في الحجرة) يا أمَّه! يا أمَّه!

جليلة     :   عامر! ما خطبك؟

عامر     :   (يدخل لاهثاً) إن خالي عقبة قد جاء بأسير معه.

جليلة     :   أين يا عامر؟

عامر     :   أدخله المربد فحبسه فيه. يقولون إنه من أصحاب محمد.

جليلة     :   من أصحاب محمد؟ ما الذي جاء به إلى خالك؟

عامر     :   لا أدري. (ينظر إلى جهة الباب) هاهو ذا خالي عقبة فاسأليه.

              (يدخل عقبة بن الحارث)

جليلة     :   من هذا الذي جئت به يا عقبة؟

عقبة     :   هذا قاتل أبينا يا جليلة. قاتل الحارث ببدر.

جليلة     :   خُبيب بن عدي؟

عقبة     :   أجل. إنك لتعرفين اسمه يا أخية.

جليلة     :   كيف لا وما من امرأة في قريش أصيب لها أحد في بدر إلا اجتهدت أن تعرف اسم قاتله فحفظته عسى أن تنتقم يوماً منه.

عقبة     :   فها هو ذا قد جئت به إليك فانتقمي منه وعذبيه.

جليلة     :   إي والله لأشفين وُحرَ صدري منه. أمكنِّي منه يا عقبة فلأقطعنه بهذا المشقص فلذة فلذة.

عقبة     :   كلا يا أختاه، لا يحلّ لنا قتله الآن حتى تنقضي الأشهر الحُرم. ولكن عذبيه عذاباً لا يقضي عليه.

جليلة     :   كأنك جئت به لتحبسه عندنا حتى ينقضي هذا الشهر، شهر المحرم؟

عقبة     :   هو ذاك.

جليلة     :   خير. سيتاح لنا بذلك أن نفتنَّ في تعذيبه.

عقبة     :   أجل. افتني في تعذيبه ما شئت. أريني براعتك يا جليلة ووفاؤك لأبيك.

جليلة     :   ثق يا أخي أنني سأريه الويل أفانين. ولكن كيف تمكنت منه يا عقبة.

عقبة     :   كان محمد قد بعثه فيمن بعث إلى بني هذيل ليعلموهم الإسلام فوثب بهم الهذليون وباعوهم إلينا.

جليلة     :   واشتريته أنت منهم؟

عقبة     :   بخمسين من الإبل.

جليلة     :   خمسين من الإبل؟

عقبة     :   استكثرتها؟ والله لو طلبوا به مائة بعير لأعطيت. إنه دم أبينا الحارث يا جليلة.

جليلة     :   صدقت كل مالٍ يُشترى به دم أبينا فهو قليل.

عقبة     :   هات له شيئاً من الطعام يا جليلة.

جليلة     :   تريد أن تطعمه؟ أتطعم قاتل أبينا يا عقبة؟

عقبة     :   لابد من إطعامه حتى لا يموت قبل أن ننزل به العقاب الأشد. قد اتفقت أنا وصفوان بن أمية على ذلك.

جليلة     :   وما شأن صفوان بن أمية؟

عقبة     :   إنه هو أيضاً اشترى منهم قاتل أبيه لينتقم منه.

جليلة     :   قاتل أمية بن حلف؟

عقبة     :   نعم.

جليلة     :   وما اسم هذا القاتل؟

عقبة     :   زيد بن الدثنة.

جليلة     :   ودفع فيه صفوان خمسين من الإبل؟

عقبة     :   نعم.

جليلة     :   إذن والله ليثرينَّ الهذليون من ذلك.

عقبة     :   (يضحك) أجل. ليتركن تجارة الأنعام. وليتجرن في أتباع محمد. (يخرج).

جليلة     :   (لابنها الصبي) انزل بنا يا عامر إلى هذا الأسير لنضربه ونعذبه. خذ تلك العصا معك.

عامر     :   لكن يا أمه..

جليلة     :   أليس برجليه القيد؟

عامر     :   بلى يا أمه.

جليلة     :   فأي شيء تخشى منه؟

عامر     :   لست أخشى شيئاً منه ولكنه لا يستحق الضرب. إنه رجل طيب.

جليلة     :   ويلك هذا قاتل جدَّك الحارث يا لُكَع.

عامر     :   ما أحسب مثل هذا الرجل يقتل أحداً يا أماه. لقد نظرت إليه من الباب. فلما رآني حيّاني وابتسم.

جليلة     :   اسكت. لو سمعك خالك عقبة تقول هذا لأدّبك فأوجعك. هيا خذ تلك العصا وانزل معي إلى المربد.

              (يأخذ عامر العصا وهو كاره ويخرج خلف والدته)

2

في المربد.. مكان مظلم له باب محكم خبيب جالس على الأرض

وفي رجليه القيد الثقيل وجليلة وابنها عامر يضربانه بالعصيّ.

خبيب     :   (يردد كلما ضرب ضربة) الحمد لله! الحمد لله!

جليلة     :   (في غيظ) ويلك. تُضرب وتقول الحمد لله. أهكذا أمركم صاحبكم محمد؟

خبيب     :   أجل يا أخت بني الحارث. إن نبينا × أوصانا بالصبر على ما نلقى في ديننا من مكروه.

جليلة     :   فدعه الآن ينفعك.

خبيب     :   إنه قد نفعنا وسينفعنا دائماً يا أخت بني الحارث.

جليلة     :   كيف ويلك؟

خبيب     :   لقد وعدنا أن من يقتل منا في سبيل الله فله الجنة.

جليلة     :   هيهات، ما وعدكم إلا غرورا.

خبيب     :   يا أخت بني الحارث لو قد سمعت من محمد كما سمعنا ما قلت هذا. أتحبين أن أسمعك شيئاً مما جاء به من عند الله؟

جليلة     :   (تضربه) كلا، لا أريد أن أسمع شيئاً.

خبيب     :   إذن يفوتك خير كثير.

جليلة     :   اسكت. والله لأضربنك حتى تكفر بصاحبك.

خبيب     :   هيهات. إنك لن تجني من ضربي غير أن تكل يدك.

جليلة     :   (تضربه بقوة) اضرب يا عامر!

خبيب     :   وتكل يد صبيك هذا.

جليلة     :   لا شأن لك. اضرب يا عامر.

عامر     :   هأنذا أضربه يا أمه.(يضربه على كره).

جليلة     :   اضربه بشدة.. بكل قوتك. (تمضي في ضربه).

خبيب     :   الحمد لله. الحمد لله. الحمد لله!

جليلة     :   أمسك عن هذا القول، ويلك!

خبيب     :   لو أمسكت عنه لأوجعني ضربك. إنه هو الذي يدرأ عني الوجع. ما بالكِ وقفت عن الضرب؟ أو قد كلَّت يدك؟ أريحيها قليلاً ثم عاودي ما أنت فيه.

جليلة     :   (في غيظ) الساعة يأتي عقبة أخي فيضربك ويوجعك.

خبيب     :   أجل يا أم عامر. دعي أخاك يفعل ذلك فهو أقوى منك ومن هذا الصبي الذي دفعته إلى ضربي فأرهقته.

  3

عامر     :   (يجيء إلى المربد متلصصا ويدخل رأسه من الباب) هل لي أن أدخل عندك أيها الأسير؟

خبيب     :   (في حنان) عامر! ادخل يا بني.

عامر     :   ولا تؤذيني أو تبطش بي؟

خبيب     :   معاذ الله. إني لأعلم أن أمك هي التي دفعتك إلى ضربي وأنت كاره.

عامر     :   أجل إنها هي التي أكرهتني. وقد قلت لها إنك رجل طيب فلم تصدقني. خبرني، أحقاً قتلت أنت جدي الحارث بن عامر؟

خبيب     :   نعم يا بني. جدك أراد قتلي فقتله.

عامر     :   وكنت تعرف أنه جدي؟

خبيب     :   لا يا بني. ما كنت أعرف أنه جدك.

              (يدخل عامر حتى يقف قريباً من خبيب).

عامر     :   ما دمت لا تعرف أنه جدي فليس بيني وبينك شيء.

خبيب     :   أجل ليس بيني وبينك غير المودة والمعروف.

عامر     :   أنت تحبني؟

خبيب     :   إي والله يا عامر.

عامر     :   إن كنت تحبني حقاً فاحك لي قصة الرجل الذي حمته الزنابير.

خبيب     :   أو قد سمعت أنت عنها؟

عامر     :   سمعت طرفاً منها وأريدها كاملة منك. ألست كنت معه؟

خبيب     :   بلى يا بني. ذاك رئيسنا عاصم بن ثابت الأنصاري ما زال يقاتل بني هذيل الذين غدروا بنا حتى قتل فأرادوا أن يجتزوا رأسه ليقدموه لامرأة في مكة كان قد قتل لها ابنين في بدر فجعلت لمن يأتيها برأسه مائة ناقة.

عامر     :   أنا أعرفها يا عم. أعرف تلك المرأة هي سلافة من آل عبد الدار التي نذرت إن قدرت على رأسه لتشربن في قحفه الخمر. لكن ما قصة الزنابير؟ أحقاً كانت كبيرة جدا كل واحد منها في حجم الحدأة؟

خبيب     :   لا تصدقهم.إنها زنابير في الحجم المعتاد طفقت تذب عن جسد عاصم وتلسع كل من يقترب منه إلى أن جاء السيل فاحتمله وذهب به حيث أراد الله.

عامر     :   يقولون إنه ساحر.

خبيب     :   لا تصدقهم يا عامر. بل هو رجل مؤمن شجاع دعا ربه دعوة فاستجابها له.

عامر     :   ماذا دعا؟

خبيب     :   كان قد قاتلهم طوال النهار فلما أيقن بالموت وخشي أن يمثلوا بجثته دعا ربه فقال: اللهم إني حميت دينك صدر النهار فاحم جسدي آخره.

عامر     :   ما دام ربه يستجيب له فلماذا لم يدعه أن ينقذه من القتل؟

خبيب     :   إنه آثر أن يموت شهيداً في سبيل الله ليدخله الله الجنة.

عامر     :   خبرني ماذا في الجنة يا عم؟

خبيب     :   فيها ما لا عين رأت ولا أذن سمعت ولا خطر على قلب بشر.

عامر     :   هل أستطيع أنا أن أدخلها؟

خبيب     :   نعم إذا آمنت بالله وبرسوله وعملت عملاً صالحا.

عامر     :   (بعد صمت يسير) اسمع يا عم.. ليس في البيت أحد فهل لك في شيء أحضره لك؟

خبيب     :   نعم احضر لي موسى يا بني.

عامر     : موسى.. ماذا تصنع بها؟

خبيب     :   إنهم سيقتلونني غداً فأريد أن أستحد بها وأتطهر حتى ألقى ربي وأنا في هيئة حسنة.

عامر     :   وأين تلقى ربك؟

خبيب     :   في الجنة إن شاء الله.

عامر     :   انتظر قليلاً.. سأحضرها لك. (يخرج).

 4

نفس المنظر السابق. خبيب يسوّي شعر لحيته وشاربه

بشفرة وبجانبه عامر يصغي إلى قصة يقصها عليه.

عامر     :   أجميل هو؟

خبيب     :   جميل جداً وطيب جداً وشجاع جداً. آه لو رأيته× لأحببته يا عامر ولو رآك هو لأحبك!

              (يسمع صوت جارية من الخارج وهي تصيح في رعب)

الصوت   :   سيدتي! سيدتي! ابنك عامر قاعد عند الأسير وفي يده شفرة ماضية.

جليلة     :   (صوتها) في يد من؟

الجارية   :   (صوتها) في يد الرجل!

جليلة     :   (صوتها) يا ويلتا سيثكلني الولد كما أثكلني الوالد. انطلقي إلى سيدك عقبة فادعيه. (تدخل جليلة وهي مرعوبة).

جليلة     :   ويلك ماذا تصنع بولدي؟

خبيب     :   (يجذب عامر إليه) قد أمكنني الله منكم مرة أخرى يا أخت بني الحارث.

جليلة     :   كلا لا تفعل. حنانك إنه صبي صغير وليس لي غيره. أليس في قلبك رحمة؟

عامر     :   لا تخافي يا أمه. إنه إنما يمزح معك.

جليلة     :   أيمزح وفي يده الحديدة؟

خبيب     :   لا تراعي يا أم عامر. إنما أردت أن أريك أنني قادر عليه لو شئت. ولكن ديني ينهاني عن ذلك وما كانت لأفعله ولو لم ينهني ديني اذهب يا بني إلى أمك.

عامر     :   لا.. حتى اسمع بقية القصة.

جليلة     :   ويلك تعال يا شقي!

خبيب     :   اذهب إليها يا بني وسأتم لك قصتي فيما بعد.

              (يدنوا الصبي من أمه فتحتضنه في فرح وهي لا تكاد تصدق أنه حي بعد).

  5

 في العراء خارج مكة وقد نصبت خشبة من جذوع النخل ليصلبوا خبيباً عليها في نشز مرتفع من الأرض. خبيب يسوقه عقبة واثنان آخران وخلفهم جليلة وعامر الصبي. ومن خارج المشهد تسمع أصوات الجمهور من الخلق الذين خرجوا ليشهدوا صلب خبيب وقتله.

خبيب     :   إن كنتم تريدون قتلي الساعة فدعوني أصلي ركعتين قبل أن تقتلوني.

أصوات   :   كلا لا تجيبوه إلى طلبه. اقتله يا عقبة! اقتله يا عقبة!

جليلة     :   مهلاً يا عقبة. أجب هذا الرجل إلى طلبه. فمن حقه أن يجاب. (همهمة استنكار من الجمع).

عقبة     :   ما خطبك يا أم عامر؟

جليلة     :   إن له يداً عندي يا عقبة. كان في وسعه أن يقتل عامراً ابني فلم يفعل.

عامر     :   أجل يا خالي أجبه إلى طلبه.

عقبة     :   صل يا هذا ما شئت واسرع.

خبيب     :   (يكبر للصلاة) الله أكبر.

  6

 خبيب     :   (يسلم من صلاته) السلام عليكم ورحمة الله. السلام عليكم ورحمة الله (ينهض قائماً). والله لو لا أن تحسبوا أن ما بي من جزع لزدت. هيا اقتلوني الساعة.

عقبة     :   هلم ارق هذه الخشبة.

خبيب     :   ويلكم أتريدون أن تصلبوني؟

عقبة     :   نعم. هل جزعت؟

خبيب     :   يا هذا إن المسلم لا يجزع من الشهادة.

              (عقبة وصاحباه يشدونه إلى الخشبة بالحبال).

خبيب     :   الحمد لله. الحمد لله. (يهم عقبة بقلته).

أصوات   :   مهلاً يا عقبة. دعنا نسأله أولاً. أتحب يا هذا أن محمداً مكانك؟

خبيب     :   لا والله ما أحب أن يؤذى محمد بشوكة في قدمه.

أصوات   :   ارجع عن الإسلام لنخلي سبيلك ولا نقتلك.

خبيب     :   ساء ما قلتم يا جند الباطل. (يدعو) اللهم أحصهم عدداً واقتلهم بدداً ولا تبق منهم أحداًَ.

عقبة     :   سمعتم ما يقول كيف يدعو عليكم؟ إني لن أقتله وحدي..هلموا كل من بيده رمح فليطعنه معي.

أصوات   :   أجل دعونا نتعاوره برماحنا من كل جانب.

خبيب     :   اللهم إنه ليس هنا أحد يبلغ رسولك عني السلام فبلغه أنت عني السلام.

              (تسمع حركة الرماح وهي تندق في خبيب والصبي وأمه يشيحان بوجهيهما عن المنظر وصوت خبيب من خلال الضوضاء والأصوات يقول:

              بلغه يا رب عني السلام!

(ستار)


اسم المستخدم  
كلمة المرور  
نسيت كلمة المرور؟           عضو جديد
كلمة البحث  
اختر القسم  
 

موقع رابطة أدباء الشام

الإسلام أون لاين

الإسلام اليوم

ناشري

موقع القصة العربية

موقع باب

مدونة أسامة

جامعة الشارقة

الخيمة العربية

المسرح دوت كم

الشاهد للدراسات الاستراتيجية

شبكة الفصيح لعلوم اللغة العربية

المبدعون العرب

ضفاف الإبداع

أقلام الثقافة

رابطة رواء للأدب الإسلامي

موقع الشاعر سالم زين باحميد

مؤسسة فلسطين للثقافة

موقع إلمقه - القصة اليمنية

عناوين ثقافية

موقع الدكتور عبد الحكيم الزبيدي

موقع الدكتور عمر عبد العزيز

موقع نبي الرحمة

موقع جدارية

الفكر التطبيقي للقرآن والسنة

مركز بيت المقدس للدراسات التوثيقية

أدب السجون

منتدى الأصلين

 
أدخل بريدك الإلكتروني  
إلغاء الإشتراك
3817560 عدد الزوار
915 عدد الأعضاء
الرئيسية - لماذا باكثير - باكثير في سطور - المسرحيات القصيرة - سجل الزوار - خريطة الموقع - تواصل معنا
© جميع الحقوق محفوظة للموقع 2001 - 2017